पूर्व पीएम चंद्रशेखर के गांव इब्राहीमपट्टी में बंद पड़े अस्पताल का डीएम ने किया निरीक्षण
बंद पड़े अस्पताल को चालू करने के लिए सांसद, एमएलसी ने किया था पहल

बलियाः पूर्व पीएम चंद्रशेखर द्वारा उनके पैतृक गांव इब्राहिमपट्टी में करोंङो की लागत से बना विशालकाय अस्पताल का अब संचालन शुरु हो सकता है। बुधवार को डीएम सौम्या अग्रवाल ने इस अस्पताल का निरीक्षण किया तो इस अस्पताल को लेकर नई उम्मीदें जग गई। डीएम ने अस्पताल के पूरे परिसर की जानकारी ली ओर गांव के प्रधान से भी वार्ता किया। पूर्व पीएम चंद्रशेखर जी द्वारा निर्मित इस अस्पताल को अस्तित्व में लाने के लिए राज्यसभा सांसद नीरज शेखर ने कुछ माह पूर्व ही सीएम योगी आदित्यनाथ से मुलाकात किया था। साथ ही एमएलसी रविशंकर सिंह पप्पू ने भी इसकी पहल किया था। शासन के निर्देश पर पिछले करीब एक साल से कई अधिकारियों की टीम बारी बारी से यहां का स्थलीय निरीक्षण कर चुकी है। डीएम के निरीक्षण के बाद जल्द ही अस्पताल के संचालन होने की उम्मीद जताई जा रही है। निरीक्षण के दौरान डीएम के साथ सीडीओ प्रवीण वर्मा, डीपीआरओ यतेंद्र सिंह, तहसीलदार ओमप्रकाश पांडेय सहित अन्य अधिकारी मौजूद रहे।
बंद अस्पताल को चालू करने के लिए राज्यसभा सांसद और एमएलसी ने शासन से की पहल
करीब तीन दशक से यहां भव्य अस्पताल पूरी तरह से खंडहर बन गया था। जिसे फिर से जीवंत करने के लिए राज्यसभा सांसद नीरज शेखर और एमएलसी रविशंकर सिंह पप्पू ने शासन से अपील किया। जिसके कारण पिछले कई महीनों से अधिकारियों की टीम यहां लगातार सर्वे कर रही है और कोरोनाकाल के बाद से जनपद में अस्पताल की कमी महसूस होने के बाद शासन प्रशासन इस भव्य अस्पताल के भवन के प्रयोग को लेकर गंभीर हुआ है। डीएम के निरीक्षण के बाद अब अस्पताल के संचालन की आस भी जग गई है।

30 एकड़ में बना है इब्राहीमपट्टी अस्पताल का विशाल भवन
पूर्व पीएम के गृह क्षेत्र इब्राहीमपट्टी में करीब 30 एकड़ में बने विशाल भवन की नींव पूर्व पीएम चंद्रशेखर जी ने सन 1952 में डाली थी। उस समय में समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण जी ने इसका विधिवत शिलान्यास किया। करोड़ों रुपए की लागत से करीब 150 बेड वाले विशाल अस्पताल का भवन लगभग ढाई दशक में बनकर तैयार हो गया। 1979-80 में इस भवन में अस्पताल का संचालन भी शुरु हुआ किंतु करीब छ माह बाद ही विभागीय लापरवाही के कारण पूरी व्यवस्था ठप हो गई। पीएम चंद्रशेखर जी के निधन के बाद तो यह पूरी तरह से विरान ही हो गया। फिलहाल इसका चंद्रशेखर जी के परिवार द्वारा रचना चक्र फाउंडेशन के तहत ही देखरेख किया जा रहा है।

500 बेड के अस्पताल का रहता है भ्रम, 150 बेड की है संपूर्ण व्यवस्था
इब्राहीमपट्टी में पूर्व पीएम चंद्रशेखर जी द्वारा निर्मित अस्पताल के विशाल भवन को लेकर कई तरह का भ्रम बना हुआ है। यह अस्पताल उस समय महज 150 बेड के लिए ही निर्मित किया गया। जबकि वर्तमान में इसे लेकर किसी तरह का शिलापट्ट या लिखित जानकारी न होने के कारण विशाल भवन के कारण 500 बेड का अस्पताल होने का भ्रम लोगों को हो जाता है। यह अस्पताल कोई सरकारी नहीं है। पूर्व पीएम चंद्रशेखर जी ने स्वयं अपनी इच्छाशक्ति से इस अस्पताल का निर्माण बलिया के लिए कराया था। उस समय तत्कालीन परिस्थितियों में केंद्र व प्रदेश सरकार द्वारा भी इस अस्पताल के निर्माण में योगदान की घोषणा की गई थी किंतु तत्कालीन प्रदेश सरकार द्वारा ही करीब 80 लाख रुपया इस अस्पताल के लिए जारी किया गया था।
चार जनपद के मरीजों को समय पर मिल सकता है आक्सीजन
बलिया जनपद मुख्यालय से करीब 75 किलोमीटर दूर बिल्थरारोड के इब्राहीमपट्टी में विशाल भवन में अगर वर्तमान में अस्थायी आक्सीजन प्लांट बन जाएं तो आसपास के देवरिया, बलिया, मऊ और गाजीपुर समेत चार जनपद के मरीजों को समय पर आक्सीजन मिल सकता है। बिल्थरारोड बलिया जनपद के आखिरी छोर पर स्थित है। यहां से देवरिया, मऊ, बलिया और गाजीपुर जनपद मुख्यालय की दूरी लगभग बराबर है।
इलाज के अभाव में ही पूर्व मंत्री शारदानंद अंचल की भी हुई थी मौत
बिल्थरारोड में समुचित इलाज की व्यवस्था के अभाव में ही सन 2010 में सपा सरकार में तीन बार मंत्री रहे शारदानंद अंचल की हर्ट अटैक के कारण मौत हो गया था। वे लखनऊ से बिल्थरारोड में एक कार्यकर्ता सम्मेलन को संबोधित करने पहुंचे थे और अचानक हर्ट अटैक आने से इलाज के लिए वापस जाने तक का समय नहीं मिला और पैतृक गांव पशुहारी जाने के दौरान रास्ते में मौत हो गया।
बेहतर चिकित्सका के अभाव में मऊ और वाराणसी पर है निर्भरता
जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर होने एवं बेहतर चिकित्सकीय व्यवस्था न होने के कारण बिल्थरारोड की लगभग 80 फिसदी चिकित्सकीय व्यवस्था पूरी तरह से पड़ोसी जनपद मऊ और वाराणसी पर ही निर्भर है। यहां से हर हर दिन बस व ट्रेन से हजारों की संख्या में लोग मऊ और वाराणसी इलाज कराने जाने को मजबूर है। बस और ट्रेन का सीधा साधन होने के कारण लोग बलिया मुख्यालय के बजाएं मऊ और वाराणसी जाना ज्यादा बेहतर मानते है।




