
लेखकः कल्याण सिंह
यूपीः सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक जीवन मे जब चर्चा नेतृत्व क्षमता की होती हैं, तो सबसे पहला नाम विस्टन चर्चिल का मन मस्तिष्क में आता हैं। जिसने द्वितीय विश्व युद्ध के समय महान लीडरशिप और साहस का परिचय दिया था।
यथा ’’हम आखिर तक लड़ेंगे, हम फ्रांस की धरती पर लड़ेंगे, हम समुद्रों और सागरों पर लड़ेंगे, हम अपने बढ़ते हुये विश्वास तथा शक्ति के साथ हवा मे लड़ेंगे, हम हर हाल मे अपने देश की रक्षा करेंगे, चाहे इसके लिए हमे कोई भी कीमत चुकानी पड़े, हम समुद्र के किनारे लड़ेंगे, हम मैदानों मे लड़ेंगे, हम खेतों मे लड़ेंगे, हम गलियों-बाजारों मे लड़ेंगे, हम पहाड़ों पर लड़ेंगे। चाहे इस लड़ाई मे हम मर जायें, लड़ेंगे पर आत्मसमर्पण नही करेंगे।’’
(4 जून, 1940 संबोधन हाउस ऑफ कामन्स)
जन्मजात नहीं मिलती लीडरशिप की क्षमता
लीडरशिप तथा लीडर का विकास जन्मजात नही होता हैं, बल्कि इसका विकास तथा प्रदर्शन अधिकांश तब होता हैं, जब हमारे सामने परेशानिया तथा मुश्किलें खड़ी दिखाई देती हैं!
सही काम करने की भावना विकसित करता है लीडरशिप
लीडरशिप का शाब्दिक अर्थ केवल भावुक भाषण देनें और जुलूसों का नेतृत्व करने का नाम नहीं ही हैं बल्कि लीडरशिप के अंतर्गत जनता के विश्वास तथा भरोसे की अत्यंत जरूरत होती हैं। इसके साथ ही लोगों के भरोसे पर खरा उतरना भी एक मजबूत लीडरशिप को इंगित करता हैं। लीडरशिप का प्रदर्शन केवल युद्ध के मैदान में नही बल्कि खेल के मैदान में, मुश्किल दौर में, विधार्थी जीवन मे छात्र राजनीति के साथ ही साथ संसदीय राजनीति में भी इसकी जरूरत अत्यंत महसूस की जाती हैं। लीडरशिप के अंदर जिम्मेदारियां, चुनौतिया, हमेशा सामने खड़ी रहती हैं, जिनसे निपटना ही सच्ची नेतृत्वक्षमता को विकसित करता हैं। लीडरशिप का अर्थ ही हैं, सही काम को करने की भावना रखना और एक मकसद के लिए खड़े होना। लीडरशिप किसी भी काम की पहल करना तथा उसका उत्तरदायित्व संभालने का ही नाम हैं। सामाजिक जीवन मे लीडरशिप प्रायः सीखा ही जाता हैं, इसके लिए किसी विशेष परीक्षा की आवश्यकता तो नहीं पड़ती हैं परंतु उचित मार्गदर्शन तथा विशेषताओं की अत्यंत जरूरत पड़ती हैं। विश्व के महान नेताओं जैसे चर्चिल, सिकंदर, हेनरी फोर्ड आदि ने कभी भी नेता बनने के लिए किसी विशेष शिक्षा कार्यक्रमो की आवश्यकता नही ली परंतु आत्मविश्वास, आत्मसम्मान से जीने के लिए गुणों को जरूर ग्रहण किया।
नेतृत्व क्षमता के लिए चाहिए दूरदृष्टि, साहस, विश्वास, जिम्मेदारी, चरित्र, व्यक्तित्व और मानवीय मूल्य
लीडरशिप एक एकल शब्द नही है बल्कि यह तत्वों का मिश्रण है न कि केवल व्याख्या या कुंजी हैं। जिस तरीके से एक तिजोरी के अलग अलग खानों को खोलने के लिए अलग अलग नंबर वाली चाभी की एक मिश्रण बनाना पड़ता है ठीक उसी प्रकार लीडरशिप के तहत विभिन्न गुण विकसित करने पड़ते है। केवल एक गुण का विकास होने से न ही किसी के अंदर नेतृत्व क्षमता का विकास हो सकता है और न ही कोई नेता बन सकता है। नेतृत्व क्षमता के लिए दुरदृष्टि, मूल्यों की स्थापना, साहस, विश्वास, भरोसा, जिम्मेदारी, उत्तरदायित्व, चरित्र, व्यक्तित्व, कृतित्व जैसे गुणों का विकास करना पड़ता है। साथ ही साथ इनमे प्रायः संतुलन भी होना चाहिए। इनमे से एक भी गुण दूसरे गुणों के बिना समाज के अंदर प्रभावी नही हो सकता है। लीडरशिप तथा एक अच्छे नेता का जन्म प्रायः छात्र राजनीति से निकले छात्र नेता की होती है। छात्र जीवन मे उच्च मापदंड, भविष्य की चिंता, रोजगार, पढाई, निपुणता, कौशल जैसे गुणों का विकास प्रायः संघर्ष के दौर के बाद ही होता है। छात्रजीवन एक नर्सरी होती हैं जिससे निकले हुये पौधे देश की दशा और दिशा को तय करते है। महाविद्यालय तथा विश्वविद्यालय मानवजीवन, छात्र जीवन में नेतृत्व के विकास के लिए एक कार्यशाला के रूप मे कार्य करते थे। उसका प्रतिफल ही था कि देश मे उस कार्यशाला से निकले हुये लोग निपुण् तथा कुशल योग्यता रखने वाले होते हुये भी जनसेवा और नेतृत्व की भूमिका को सहर्ष स्वीकार करते हुये समाज और देश के विकास मे अपनी अग्रणी भूमिका निभाते थे। छात्र राजनीति के अंदर जिम्मेदारी, उत्तरदायित्व, अवसर, अधिकारो को प्राप्त करने की जिज्ञासा होती हैं। अवसर को सफलता मे बदलने की अद्भुत सोच, संघर्ष रूपी जीवन जीने की कला, परिवर्तन रूपी सोच, का विकास अटूट से रूप से जुड़ा होता हैं। हर एक अधिकार, जिम्मेदारी की ओर, हर एक अवसर एक दायित्व की ओर, और हर एक अधिकार एक कर्तव्य भावना को जन्म देता है और उसे विकसित करता है। लीडरशिप के लिए सत्ता को पर्यायवाची नहीं माना जा सकता हैं। बल्कि मार्गदर्शन करना तो वह क्रिया हैं जो दूसरे को प्रेरित करती हैं और कपटी तथा भ्रष्ट नेताओं से हमेशा एक कदम आगे ही दिखाई देती नजर आती है। सत्ता से प्राप्त की गयी ताकत भय को जन्म देने का कारण बनती हैं। ज्यादा से ज्यादा यह आज्ञाकारिता को पैदा कर सकती हैं, परंतु मित्रभाव नहीं।
लीडरशिप से ताकत पाने वाले नेता में आती है मजबूती
एक समाज तब खतरे में पड़ जाता हैं, जब नेतृत्व उन लोगों के हाथ में दे दिया जाता हैं जिन्होंने खुद कभी आज्ञा का पालन करना सीखा ही नही। परंतु किसी भी नेतृत्व क्षमता मे अगर व्यक्तित्व और सिद्धांत को जोड़ दिया जाये तो वह और मजबूत दिखाई देने लगता हैं। नेता के अंदर मजबूती तब आती हैं जब वह लीडरशिप के द्वारा ताकत प्राप्त करता हैं, वह ताकत संस्थागत हो सकता हैं या फिर अनौपचारिक। लीडरशिप मे ताकत व्यवहार के द्वारा, पदवी, उपाधि, प्रभुत्व, योग्यता, कुशलता, सिद्धांत आदि ही ताकत को जन्म देती हैं। सत्ता की वैशाखियो के सहारे आप ज्यादा दिन तक ताकत को बरकरार नही रख सकते हैं।
सत्ता भ्रष्ट बनाती हैं पर निरंकुश सत्ता पूर्णतया भ्रष्ट बनाती है
कहा ही गया हैं कि ’’सत्ता भ्रष्ट बनाती हैं पर निरंकुश सत्ता पूर्णतया भ्रष्ट बनाती हैं। परंतु जब कभी योग्य, मुल्यवान व्यक्ति नेतृत्व का भार संभालने के लिए आगे नहीं आते हैं तो उनके आसपास का माहौल गंदे-खून चूसने वाले परजीवियों से भर जाता हैं, जो दूसरों की सेवा करने की बजाय, अपनी ही सेवा करवाते रहते हैं।



